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"हवस और इश्क "
बात करे अगर हम हवस और इश्क की
तो आजकल हवस ने इश्क को रहने नहीं दिया है,
अगर रहने भी दिया है तो बेड़ियाँ है जो यकीन को जकड़े है l पहले के दौर में हर चीज़ को लेकर बहुत ज्यादा नॉर्मल बाते समझ मे आ जाती थी, मगर आज के दौर में इसको समझ पाना बहुत कठिन हो गया है क्यूंकि परिस्थितियों को देख कर कोई भी यकीं नहीं कर सकता है. इसका जिम्मेदार कौन?
कहा से पसरा है ये असंतोष कौन लेकर आया इसको हमारी संस्कृति मैं, यह पहले तो नहीं था रिश्तों के मूल्य भी थे और उन मूल्यों की कल्पना करना थोडा मुस्किल है l
रिश्तों के मूल्य से तात्पर्य यहा इस चीज़ से है कि अहमियत, जहा फरेब का कोसों तक कोई निशान नहीं था बस पाकीजा रिश्ते होते थे..
कहा से आया है ये फरेब आखिर क्यूँ हमारी संस्कृति इतनी इस सब चीजों मे लिप्त होती जा रही है,?
कहीं बाप बेटे को, बेटा माँ को, प्रेमी प्रेमिका को, पति पत्नी को, पत्नी पति को कहीं ना कहीं झूट मे, फरेब मे उलझा रखती है या करती है आप सबने इस चीज़ को भली भांति देखा होगा.. इन सब चीजों के पीछे वज़ह क्या है? कोई बतायेगा
किसी के पास इसका उत्तर नहीं होगा क्यूंकि जो जेसा देखता है वैसा सीखता है यह बात कोई झुठला नहीं सकता है बहुत कम ऐसे लोग होंगे जो अपने आप को इन सब चीजों से बचा पाते हैं और वहीं इतिहास हो जाते हैं l
मसला यहा हवस और इश्क का है? क्या अन्तर है दोनों मे...?
अन्तर इतना है एक पाकीजा है और दूसरा तलब
पहले मे नायक नायिका के पाकीजा प्रेम का सृजन है जो अनंत असीमित भवना को समेटे होता है
दूसरे मे भावना की अपेक्षा एक चाह होती है जैसे किसी नशे की लत की तरह जहा पर प्रेम के मायने कम लत के मायने ज्यादा हो जाते हैं l
यह सब आज कल के सिनेमा, अश्लील साहित्य और भी ऐसी चीजे है जो इस हवस का निर्माण करने मे पूरी तरह जिम्मेदार है l क्यूंकि बिना किसी बीज के पौधे का पनप पाना मुमकिन नहीं होता है, आजकल हवस का चलन इतना व्याप्त हो गया है कि व्यक्ती इसके मद में अपने खून के रिश्तों को तार तार कर देता है l आम तौर पर आप लोगों ने इसको अपने आसपास देखा होगा या अखबारों किस्सों मे प़डा होगा
बात यहा ये आती है कि हम को इसको रोकना चाहिए क्यु क्यूंकि हमारी आने वाली संस्कृति के लिए यह चीज़ बहुत घातक साबित होगी, हमारी संस्कृति का दमन कर सकती है यह इसको रोकने के लिए क्या प्रयास किए जाए आप कमेन्ट करके अपनी राय बताएं.....
जा रही है संस्कृति विनाश की कगार पर
आदमी सोचता नहीं अपने ही व्यावहार पर
मीट रहा वज़ूद है हर तरफ पसरा द्वेष है
मर्यादा की सीमा दुनिया लांघती सृष्टि विनाश को पुकार रही
हवस के दानव ने सबकुछ लील लिया है
अब तो इसका संहार हो
युद्ध का ये क्षेत्र है मिटा रहा अस्तित्व को
अब समय आ गया प्रहार का जवाब प्रहार हो
#पायल कुमारी
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