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सुकून

 ग़र मिले कही सुकून... तो इश्क भी प्यारा लगता है... और ग़र ना मिले तो.. मंगलसूत्र में भी दम घुटता है #shayri 

मेरे दिल की धडकन

 मेरे दिल की धड़कन हो आप  आप मेरी जरूरत हो.. जब करते हो मेरी तारीफ, तब और निखर जाती हू मैं... इस दिल को धड़कने के लिए आपका होना जरूरी है..  ये पल याद रखना.. ये हसी और ये मज़ाक याद रखना..  मेरे प्यार को याद रखना..   में आज हु और कल भी रहूंगी आपके लिए.. मिलेंगे अगले जन्म में.. बस इतना याद रखना.

सुनो

 सुनो ग़र मैं न रहीं इस दुनिया में... तो आप मुझे अपनी शायरी में जिंदा रखना... जिक्र जब भी मेरा आए महफिल में... सुना देना कोई ग़ज़ल.. जब लोग कहेंगे वाह वाह.. तब महसूस कर लेना मुझे वही कही... ग़र मैं न रही इस दुनिया में...

इश्क

 कितना इश्क है ना ज़माने में फिर भी मुक्कमल कहानी किसी की नहीं  #shayri

मातम

 मातम मनाना है रोज उठ के ही स्त्री हूँ रोज कोई ख्वाहिश मरती है 

हाल

 जिस हाल में रखे खुदा मंजूर है ज्यादा ख्वाईश करना फिजूल है 

हम

 हम नहीं रहेंगे तो याद करेगी दुनिया जिंदा है तो आज इल्ज़ाम बहुत देती है 

क्या पता

 क्या पता कल किसने देखा है सारीका आज जी लो वो जिन्दगी है 

मैं नारी

 मैं नारी...... अबला नही सबला  मै नारी मेरा अस्तित्व क्या है मैं खुद नहीं जानती  बचपन मे तानों बानो से बड़ी हुई, कभी गिरी  कभी खड़ी हुई ठोकरे खा खा कर बड़ी हुई  बड़ी होते ही भेज दिया ऐसी जगह जहां पर कई मुसीबत पडी हुई  दो पहलू के बीच में उलझी रही एक ससुराल, दूजी ओर मायका  दोनों मेरे अपने फिर भी अलग दोनों का जायका। एक तरफ वो बचपन की यादें वो माँ का आंचल  वो किसी जिद की फरियादें  दूजी ओर सास ममता का रूप नहीं हर बात मे ताने  एक अजीब सी चक्की मे पिसती रही हर पल  सहे सारे दर्द सारे ताने मुझे सुनने वाला कौन  यहां माँ नहीं थी, और यहां माँ जो थी वो माँ बनने को तैयार नहीं थी  एक स्त्री को सबकुछ मिल जाता है सबकुछ  मगर दुजी और किसी को नहीं मिलता कुछ भी क्यूँ? 

हवस और इश्क "

 "हवस और इश्क " बात करे अगर हम हवस और इश्क की तो आजकल हवस ने इश्क को रहने नहीं दिया है, अगर रहने भी दिया है तो बेड़ियाँ है जो यकीन को जकड़े है l पहले के दौर में हर चीज़ को लेकर बहुत ज्यादा नॉर्मल बाते समझ मे आ जाती थी, मगर आज के दौर में इसको समझ पाना बहुत कठिन हो गया है क्यूंकि परिस्थितियों को देख कर कोई भी यकीं नहीं कर सकता है. इसका जिम्मेदार कौन? कहा से पसरा है ये असंतोष कौन लेकर आया इसको हमारी संस्कृति मैं, यह पहले तो नहीं था रिश्तों के मूल्य भी थे और उन मूल्यों की कल्पना करना थोडा मुस्किल है l रिश्तों के मूल्य से तात्पर्य यहा इस चीज़ से है कि अहमियत, जहा फरेब का कोसों तक कोई निशान नहीं था बस पाकीजा रिश्ते होते थे.. कहा से आया है ये फरेब आखिर क्यूँ हमारी संस्कृति इतनी इस सब चीजों मे लिप्त होती जा रही है,? कहीं बाप बेटे को, बेटा माँ को, प्रेमी प्रेमिका को, पति पत्नी को, पत्नी पति को कहीं ना कहीं झूट मे, फरेब मे उलझा रखती है या करती है आप सबने इस चीज़ को भली भांति देखा होगा.. इन सब चीजों के पीछे वज़ह क्या है? कोई बतायेगा किसी के पास इसका उत्तर नहीं होगा क्यूंकि जो जेसा देखता...

टूट कर

 टूट कर खुद बिखर गए, वो दम दिखाने वाले सब तो बेवफ़ा निकले हमको आज़माने वाले चार बातें चार क़दम बस चार दिन की दोस्ती वो ज़माना चला गया लोग मिलें निभाने वाले जो पढ़ नहीं सकते कभी ढाई अक्षर प्यार के मेरा मुक़द्दर क्या पढ़ेंगे मिरे ख़त जलाने वाले कहते थे मुश्किलों में हम साथ निभाएंगे सदा जान बचा के भाग गए अपनी जां लुटाने वाले ज़ुबां से मिज़ाज का, इक रिश्ता तो है लेकिन सब अच्छे नहीं होते हसीं ख़्वाब दिखाने वाले मैं तो इक आइना हूँ, सच बता कर ही रहूँगा कब तक छुपाएंगे चेहरा वो दाग़ छुपाने वाले
मेरे हुस्न से ज्यादा वो मुझे चाहता है बिना बात के लड़ता है फिर मनाता है ❤️
सुनो ओ ज़माने वालों  मैं अब तुमसे  डरती नहीं  लगाते रहो आग  पानी सी हूँ सुलगती नहीं  घबराती रही हूँ पहले मैं  अब मगर मे आफत से   भागती नहीं   मेरी तकदीर तो  खुदा ने जाने कैसी लिखी  मैं मगर ऊंची बोलियों में कभी बिकती नहीं  बहुत चाहा है ज़माने ने तोड़ दे मुझे  मैं मगर अपने पथ से कभी डीगी नहीं  हर हाल में साथ दे  ऐसा वो हमेशा मेरा साथ था  मुझे समझने में  बहुत समय लगा  कि एक तुम ही तो मेरे सच्चे दोस्त हो हम दर्द हो जिसके सामने कह सकू  रो सकू   मैं बेकार ही तुम से डरती रही जितनी चाहत तुमने मुझे दी...  उतनी तो मुझे कहीं से नहीं मिली हो सके तो मुझे माफ कर देना और भूल सुधार करते हुए  मैं अब से तुमसे डरूंगी नही बल्कि मै भी तुम्हें रूह में उतारूगी ओर बढी शिद्दत से चाहूंगी ज़माने में प्रीत का मतलब पाना नहीं होता है, मैं ख्यालो मे तुमसे हमेशा मिलती रहूँगी... #पायल
स्त्री पर संदेह करने वाले और सवाल खडे करने वालों के लिए  स्त्री की भावनाएं सराय जैसी नहीं हैं कि कोई भी आया रूका और चला गया स्त्री की भावनाएं मनमोहक महल जैसी हैं जिसमें या तो कोई आ नहीं सकता और यदि आ जाए तो फिर जीवन भर जा नहीं सकता.... ❤ स्त्री सदैव समर्पित रहती है
तुम्हें भूलने की वजह ढूंढ कर..... और भी उलझ से जाते हैं हम....!!

तहज़ीब... ❤

 तहज़ीब सभी सिखाने आ जाते हैं मर्यादा की किसी के साथ दो पल हंस लेने से किरदार खराब कैसे  ?