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एक कहानी...
आइए दोस्तों आपको एक कहानी सुनाती हूं
बताना ये कहानी आपको कैसी लगती है ये हक़ीक़त है
और हक़ीक़त से जुड़ी हुई है...
एक मामूली सी लडकी जिसकी कोई ज्यादा ख्वाहिश नहीं
कोई फर्माईश नहीं सदा खुद मे मगन रहने वाली लडकी
जो हमेशा से सबका मान रखती सभी का सम्मान करती
दूसरों की खुसी की खातिर अपने वज़ूद को मिटा कर अक्सर प्रयास मे लगी रहती की किसी को कोई तकलीफ ना हो l सच मैं ऐसा किरदार था उसका जैसे कोई खुदा की मुरत हो हर अंदाज कमाल का उसका, उसके बड़ो को नाज़ था उस पर की उनका सर कभी झुकने नहीं देगी घुटने उनके किसी के सामने टिकने नहीं देगी, वो वैसी ही थी सभी की लाडली सुरुवात से l
शादी के बाद हर किसी के कुछ सपने होते हैं, बाबुलाल का घर पराया और पराये फिर अपने होते हैं, बंद किसी बक्से सी होती है आगे की जिंदगी क्या होगा पता नहीं पर बस एक उम्मीद के साथ उसका निर्वाह करना होता है जो नियति है l वो उसका निर्वाह भी करती है हर किसी के इम्तहान मे खरा भी उतरती है पर फिर भी उसे कोई ना कोई टोके बात बात में डांटे तो जैसे उसकी हिम्मत टूट जाए, अनजाने लोगों के बीच जब ऐसा होता है तो अक्सर किरदार टूट जाता है तो लोग क्यूँ ऐसे होते हैं जो किसी को समझना नहीं चाहते हैं बस वो अपनी मस्ती में मस्त रहकर चकनाचूर करते रहते हैं रिश्तों को उन रिश्तों को जो कि पुराणों मे किसी उपहार से कम नहीं लिखे गए हैं, अक्सर ऐसे ताने सुनकर वो खुद को बहलाया करती थी बैठे कर कोने में जैसे अपनी कहानी दोहराया करती थी l देखा था मैंने उसका हाल दूर से वो जुबा से खामोश नजरो से कुछ बताया करती थी l हंसती खेलती आई थी अब तो जैसे मुर्झा कर रोया करती थी शादी एक ख़ाब हसीन है पर सबके लिए नहीं ऐसा क्यूँ l क्यूँ लोग ऐसे हो जाते हैं पल में
बदलना तो नियति है पर इतनी जल्दी कैसे क्या कसूर था उस लडकी का जो खुशिया उसने चाह ली क्या गुनाह उसने कर दिया जो उसको ये सजा मिली...
रोती थी बिलखती थी
गुड़िया एक ऐसी दिखती थी
मैं अपने घर की चार दीवारी से
रोज उसको देखा करती थी
मायूसी उसकी सब कुछ बयां करती थी
वो मगर कुछ भी कहने से डरती थी
उसके नन्हें कदम से घर में रौनक आई थी
अब तो उसकी पाजेब भी राग दर्द का
गाया करती थी
हंसती हुई उसकी दुनिया जाने क्यूँ उजड़ी जाती थी
भगवान जाने कहां रहता था जहां पर फ़रियाद नहीं जाती थी
किसी के हिस्से में गुलाब है तो किसी के हिस्से में कांटे
उसकी रूदन से सारी गली रुआँसी हो जाती थी
कैसे बताऊँ उस दर्द को मैं अपने शब्दों के भीतर
सोचने भर से मेरी आंखे भर आती थी
चली गई वो छोड़ के सबको अपने हालातों पर
जली इतना की रूह भी कांप जाती थी
रहकर अलग अब वो परिवार से खुद का गुजारा कर लेगी
इतने दर्द सहे है उसने की अब वो रिश्तों से तौबा कर लेगी
Sahi baat Hai
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